पाकिस्तान की राजनीति और कूटनीति में इन दिनों एक ऐसी यात्रा की चर्चा है, जिसने वहां की सिविल सरकार की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान हाल ही में पाकिस्तान पहुंचे, लेकिन इस दौरे में जो कुछ हुआ, उसने इस्लामाबाद के गलियारों में खलबली मचा दी है। प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर राष्ट्रपति जरदारी का स्वागत में न आना और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को सिर्फ ‘चंद मिनट’ देना, पाकिस्तान की सत्ता के असली केंद्र की कहानी बयां कर रहा है।
निजी दौरा या कूटनीतिक ड्रामा?
वरिष्ठ राजनयिक सूत्रों की मानें तो शेख मोहम्मद की यह यात्रा कोई आधिकारिक राजकीय यात्रा (State Visit) नहीं थी, बल्कि यह पूरी तरह से एक निजी दौरा था। हालांकि, पाकिस्तान सरकार और वहां के मीडिया के एक वर्ग ने इसे जबरन एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश करने की कोशिश की।
पाकिस्तान के डिप्टी पीएम इशाक डार ने खुद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह स्वीकार किया कि 26 दिसंबर को UAE राष्ट्रपति अपनी ‘आधिकारिक और निजी’ यात्रा पर आए थे। मुलाकात की जगह भी कोई राष्ट्रपति भवन या पीएम आवास नहीं, बल्कि रावलपिंडी का नूर खान एयरबेस था। इसी एयरबेस पर छोटी सी मुलाकात के बाद शेख मोहम्मद रहीम यार खान में शिकार के लिए निकल गए।
जरदारी गायब, शहबाज को मिला सिर्फ ‘शिष्टाचार’
राजनयिक परंपरा के अनुसार, जब भी किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष आता है, तो उसका स्वागत खुद देश का राष्ट्रपति करता है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी इस पूरे दौरे से नदारद रहे। उन्होंने UAE राष्ट्रपति से मुलाकात तक नहीं की।
वहीं, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मुलाकात की कहानी और भी चौंकाने वाली है। सूत्रों के मुताबिक, नूर खान एयरबेस पर शहबाज शरीफ और शेख मोहम्मद के बीच बातचीत सिर्फ 4 से 5 मिनट चली। इस मुलाकात में न तो किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा हुई, न ही किसी समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। यह सिर्फ एक औपचारिक शिष्टाचार और फोटो सेशन तक सीमित रहा।
आर्मी हाउस में 5 घंटे, आखिर पाकिस्तान में किसका पलड़ा भारी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर UAE राष्ट्रपति ने इस्लामाबाद जाने का न्योता ठुकरा दिया, तो वे गए कहां? सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, शेख मोहम्मद ने अपनी पूरी मौजूदगी रावलपिंडी तक सीमित रखी। वे लगभग पांच घंटे तक आमी हाउस और जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में मौजूद रहे।
बताया जा रहा है कि इस यात्रा का असली मकसद सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर द्वारा आर्मी हाउस में आयोजित एक निजी पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होना था। यानी, अरब के सुल्तान पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार के नहीं, बल्कि सेना प्रमुख के मेहमान बनकर आए थे।
विदेश नीति पर सेना का शिकंजा?
भले ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने निवेश, ऊर्जा और व्यापार के बड़े-बड़े दावे किए हों, लेकिन हकीकत में कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। सूत्रों का कहना है कि शेख मोहम्मद और असीम मुनीर के बीच गाजा के लिए प्रस्तावित ‘इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स’ को लेकर कुछ संक्षिप्त चर्चा हुई।
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर दुनिया के सामने यह साबित करता है कि पाकिस्तान की विदेश नीति की चाबी प्रधानमंत्री आवास में नहीं, बल्कि रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय में है। आने वाले हफ्तों में असीम मुनीर का UAE दौरा भी प्रस्तावित है, जो इस ‘खास दोस्ती’ पर मुहर लगाएगा।
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