ताजिकिस्तान सीमा पर तालिबान का खूनी खेल! अंधाधुंध फायरिंग में कई चीनियों की मौत, क्या छिड़ने वाली है भीषण जंग?

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मध्य एशिया के अशांत गलियारों से एक बेहद डरावनी खबर सामने आ रही है। अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान की सीमा पर हालात इतने बेकाबू हो गए हैं कि अब वहां युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। ताजिकिस्तान सरकार ने दावा किया है कि अफगानिस्तान की ओर से आए हमलावरों ने सीमावर्ती इलाकों में भारी उत्पात मचाया है, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोगों की जान चली गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मरने वालों में कई चीनी नागरिक भी शामिल हैं, जो ताजिकिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे।

सीमा पर खूनी झड़प: आखिर हुआ क्या?

ताजिकिस्तान की ‘स्टेट कमेटी फॉर नेशनल सिक्योरिटी’ के अनुसार, शमसुद्दीन शोखिन जिले में आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। बताया जा रहा है कि अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत से तीन हथियारबंद आतंकी सीमा पार कर ताजिकिस्तान के इलाके में घुस आए थे। अगली सुबह जब बॉर्डर गार्ड्स ने उन्हें घेरा, तो दोनों तरफ से गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी। इस गोलीबारी में तीनों आतंकियों समेत पांच लोग मारे गए। घटनास्थल से अमेरिकी एम-16 राइफलें, कलाश्निकोव और नाइट-विजन स्कोप जैसे खतरनाक हथियार बरामद हुए हैं।

चीनियों को क्यों बनाया जा रहा निशाना?

ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच करीब 1,340 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो ऊंचे पहाड़ों और पांज नदी के दुर्गम रास्तों से गुजरती है। इसी का फायदा उठाकर आतंकी अक्सर घुसपैठ करते हैं। अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार आतंकियों का मुख्य निशाना ताजिकिस्तान में काम कर रही चीनी कंपनियां थीं।

हाल के दिनों में दो बड़े हमले हुए:

  1. ड्रोन अटैक: एक चीनी गोल्ड माइनिंग कंपनी के कैंप पर ड्रोन से विस्फोटक गिराए गए।

  2. अंधाधुंध फायरिंग: सड़क निर्माण में लगे मजदूरों पर गोलियां बरसाई गईं, जिसमें दो चीनी नागरिक मौके पर ही मारे गए।

ताजिकिस्तान पर चीन का भारी कर्ज है और वहां की ज्यादातर सुरंगें, बिजली परियोजनाएं और सोने की खदानें चीनी कंपनियां ही चला रही हैं। जानकारों का मानना है कि आतंकियों का मकसद चीन को डराना और इस क्षेत्र में उसके निवेश को रोकना है।

तालिबान पर फूटा ताजिकिस्तान का गुस्सा

ताजिक अधिकारियों ने सीधे तौर पर तालिबान को इन हमलों के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा, “यह तालिबान की नाकामी है कि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए होने दे रहे हैं। वे अंतरराष्ट्रीय वादों को निभाने में पूरी तरह फेल रहे हैं।” ताजिकिस्तान ने तालिबान से इस कत्लेआम के लिए माफी मांगने और सुरक्षा पुख्ता करने की मांग की है।

पर्दे के पीछे कौन? ISKP का खौफ

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन हमलों के पीछे इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) का हाथ हो सकता है। ISKP का पुराना एजेंडा रहा है कि वह विदेशी नागरिकों और प्रोजेक्ट्स पर हमला करके दुनिया को यह दिखाए कि तालिबान अफगानिस्तान को संभालने में असमर्थ है। काबुल के विश्लेषक इब्राहिम बहिस का कहना है कि ISKP जानबूझकर विदेशियों को निशाना बना रहा है ताकि तालिबान प्रशासन की साख मिट्टी में मिल जाए।

तालिबान की सफाई: ‘मगरमच्छ के आंसू’ या मजबूरी?

तालिबान ने चीनी मजदूरों की मौत पर “गहरा दुख” जताया है और इसे ‘अराजक तत्वों’ की साजिश बताया है। तालिबान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने दोहराया कि वे दोहा समझौते पर कायम हैं और अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं होने देंगे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि तालिबान के पास ISKP को रोकने की ताकत नहीं है, जिससे आने वाले दिनों में ताजिकिस्तान सीमा पर हिंसा और बढ़ सकती है।


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लेखक

  • चेतन पवार को शोधपरक लेखन में विशेष रुचि है। वर्तमान में वे हिंदी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए लेखन करते हैं, जहाँ वे समाचार और जानकारियों को स्पष्टता, सटीकता और सही संदर्भों के साथ पाठकों तक पहुँचाते हैं। जटिल विषयों को सरल और प्रभावी हिंदी में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की पहचान है।

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