खालिदा जिया के बेटे ‘कोको’ की अनसुनी कहानी: जिसने राजनीति छोड़ बांग्लादेश क्रिकेट की किस्मत बदल दी!

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बांग्लादेश की सियासत में इन दिनों जबरदस्त हलचल है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बड़े बेटे तारिक रहमान वतन वापस लौट चुके हैं और अपनी मां व दिवंगत पिता जियाउर रहमान की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर तारिक फरवरी में होने वाले आम चुनावों की कमान संभाल रहे हैं। समर्थकों के बीच उन्हें ‘भावी प्रधानमंत्री’ के रूप में देखा जा रहा है।

लेकिन इस सियासी शोर के बीच एक ऐसा नाम भी है, जिसकी चर्चा आज भी बांग्लादेश के खेल गलियारों में बड़े सम्मान के साथ की जाती है। वह नाम है खालिदा जिया के छोटे बेटे अराफात रहमान ‘कोको’ का। जहां एक भाई ने सत्ता और सियासत की राह चुनी, वहीं दूसरे ने खुद को राजनीति से दूर रखकर बांग्लादेश क्रिकेट की तस्वीर बदलने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी।

कौन थे अराफात रहमान ‘कोको’?

अराफात रहमान ‘कोको’ का जन्म 12 अगस्त 1969 को कुमिल्ला कैंटोनमेंट में हुआ था। एक ऐसे परिवार में जन्म लेने के बावजूद जहां सुबह की चाय के साथ राजनीति की चर्चा होती थी, कोको का दिल खेल के लिए धड़कता था। उनके पिता राष्ट्रपति थे और मां प्रधानमंत्री, चाहते तो कोको भी सत्ता के गलियारों में रसूख जमा सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान क्रिकेट के मैदान और बोर्ड रूम में बनाई।

बांग्लादेश क्रिकेट के ‘गेम चेंजर’

कोको ने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) के विकास और अनुशासन समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया। उस समय बांग्लादेशी क्रिकेट अपने शुरुआती दौर में संघर्ष कर रहा था। कोको की दूरदर्शी सोच ही थी जिसने ‘हाई-परफॉर्मेंस यूनिट’ और युवा खिलाड़ियों को तराशने के लिए ठोस ढांचा तैयार किया।

एक शांत अंत और अधूरी विरासत

अराफात रहमान कोको का जीवन विवादों और निर्वासन से भी अछूता नहीं रहा। राजनीतिक उतार-चढ़ाव के कारण उन्हें देश छोड़ना पड़ा। 24 जनवरी 2015 को मलेशिया में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। जब उनका पार्थिव शरीर ढाका लाया गया, तो लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी थी, जो यह बताने के लिए काफी था कि कोको ने बिना सक्रिय राजनीति में आए भी लोगों के दिलों में जगह बना ली थी।

आज जब उनके बड़े भाई तारिक रहमान प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, तब बांग्लादेश क्रिकेट का इतिहास लिखते समय अराफात रहमान ‘कोको’ का नाम सुनहरे अक्षरों में याद किया जाता है। उन्होंने साबित किया कि राष्ट्र सेवा के लिए हमेशा भाषण देना जरूरी नहीं, कभी-कभी खेल के मैदान को सींचना भी देश के लिए सबसे बड़ी सेवा होती है।

लेखक

  • दिव्यांशु शोध-लेखन के प्रति बेहद जुनूनी हैं।
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