आज के आधुनिक दौर में स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद कई ऐसी बीमारियां हैं जो जन्म के साथ ही बच्चों के जीवन को चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। इन्हीं में से एक गंभीर स्थिति है ‘Spina Bifida‘ (स्पाइना बिफिडा)। सरल शब्दों में कहें तो यह रीढ़ की हड्डी से जुड़ी एक जन्मजात समस्या है, जिसमें रीढ़ की हड्डी और उसके आसपास की तंत्रिकाएं (nerves) पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती हैं।
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क्या होता है स्पाइना बिफिडा?
स्पाइना बिफिडा को ‘न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट’ (NTD) का एक प्रकार माना जाता है। गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में, भ्रूण की न्यूरल ट्यूब विकसित होकर मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी बनाती है। जब यह ट्यूब पूरी तरह बंद नहीं हो पाती, तो रीढ़ की हड्डी में गैप या छेद रह जाता है, जिसे स्पाइना बिफिडा कहते हैं। यह समस्या पीठ के किसी भी हिस्से में हो सकती है।
मुख्य प्रकार और उनके लक्षण
स्पाइना बिफिडा ओकुल्टा (Occulta): यह सबसे सामान्य और हल्का प्रकार है। इसमें रीढ़ में छोटा सा छेद होता है लेकिन बाहर कोई उभार नहीं दिखता। अक्सर लोगों को इसका पता भी नहीं चलता।
मेनिनगोसील (Meningocele): इसमें रीढ़ की हड्डी की सुरक्षात्मक परत पीठ पर एक थैली के रूप में बाहर आ जाती है, लेकिन नसें सुरक्षित रहती हैं। सर्जरी से इसे ठीक किया जा सकता है।
माइलोमेनिनगोसील (Myelomeningocele): यह सबसे गंभीर स्थिति है। इसमें रीढ़ की हड्डी की नसें थैली के साथ बाहर निकल आती हैं, जिससे बच्चे को चलने-फिरने या मूत्राशय (bladder) के नियंत्रण में गंभीर समस्या हो सकती है।
क्यों होती है यह बीमारी? (प्रमुख कारण)
हालांकि वैज्ञानिक अभी भी इसके सटीक कारणों की जांच कर रहे हैं, लेकिन कुछ प्रमुख कारक सामने आए हैं:
फोलिक एसिड की कमी: गर्भावस्था से पहले और दौरान शरीर में फोलिक एसिड (विटामिन B9) की कमी इसका सबसे बड़ा कारण मानी जाती है।
अनुवांशिकता: यदि परिवार में पहले किसी को यह समस्या रही है, तो जोखिम बढ़ जाता है।
मधुमेह और मोटापा: मां को शुगर की बीमारी या अत्यधिक वजन होने से भी खतरा रहता है।
दवाइयों का असर: मिर्गी (epilepsy) जैसी बीमारियों के लिए ली जाने वाली कुछ दवाएं भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।
बचाव और इलाज के तरीके
स्पाइना बिफिडा का कोई स्थाई इलाज नहीं है, लेकिन सर्जरी और थेरेपी से जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण है बचाव। डॉक्टरों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त मात्रा में फोलिक एसिड लेना चाहिए। प्रसव से पहले नियमित अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट के जरिए इस स्थिति का पता लगाया जा सकता है। गंभीर मामलों में, डॉक्टर बच्चे के जन्म के तुरंत बाद या जन्म से पहले ही (fetus surgery) ऑपरेशन की सलाह देते हैं।
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