Current date 17/03/2026

SHOCKING! Supreme Court में चुनौती: बिहार Voter List संशोधन से लाखों लोग हो सकते हैं वोटिंग से बाहर!

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बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान का मुद्दा अब सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है
बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान का मुद्दा अब सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है (file photo)
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बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान का मुद्दा अब सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। एसोसिएशन ऑफ डेमेक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके चुनाव आयोग के इस आदेश को चुनौती दी है। संगठन का कहना है कि यह आदेश भारतीय संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है।

याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चुनाव आयोग का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और उसके रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टोर्स रूल 1960 के नियम 21ए का भी उल्लंघन करता है। इसलिए एडीआर ने मांग की है कि 24 जून को जारी किया गया चुनाव आयोग का आदेश रद्द किया जाए।

क्यों है यह मामला गंभीर?

एडीआर का दावा है कि अगर चुनाव आयोग के इस आदेश को रद्द नहीं किया गया, तो यह बिना उचित प्रक्रिया के मनमाने ढंग से लाखों मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर सकता है। याचिकाकर्ता का मानना है कि इससे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया कमजोर हो सकती है, जो संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न हिस्सा है।

विशेष चिंता का विषय यह है कि जिस तरह से उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना कम समयावधि में विभिन्न दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं, उससे कई वास्तविक मतदाता मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं और अपने मतदान के मौलिक अधिकार से वंचित रह सकते हैं।

नियमों का उल्लंघन कैसे?

याचिका में बताया गया है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता साबित करने का बोझ नागरिकों पर डाल दिया है। आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे सामान्य पहचान दस्तावेजों को इस प्रक्रिया से बाहर रखने से हाशिये पर पड़े समुदायों और गरीब वर्ग के लोगों पर विशेष रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

इसके अलावा, इस प्रक्रिया में मतदाताओं को न केवल अपनी नागरिकता साबित करने के लिए बल्कि अपने माता-पिता की नागरिकता भी प्रमाणित करने के लिए दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। एडीआर का कहना है कि यह अनुच्छेद 326 का उल्लंघन है, क्योंकि इन आवश्यकताओं को पूरा न करने पर व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है।

समय सीमा और व्यावहारिक समस्याएं

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया है कि चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण के लिए एक अव्यवहारिक समय सीमा निर्धारित की है, विशेषकर नवंबर 2025 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों को देखते हुए।

बिहार में गरीबी और पलायन का उच्च स्तर है, जहां एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसके पास जन्म प्रमाणपत्र या अपने माता-पिता के रिकॉर्ड जैसे आवश्यक दस्तावेजों तक पहुंच नहीं है। कई लोग ऐसे हैं जिनका नाम 2003 की मतदाता सूची में नहीं था और जिनके पास विशेष सघन पुनरीक्षण आदेश में मांगे गए दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं।

हालांकि कुछ लोग इन दस्तावेजों को प्राप्त करने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन निर्धारित की गई कम समय सीमा उनके लिए एक बड़ी बाधा बन सकती है। इस प्रकार, यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हाशिए पर पड़े वर्गों की भागीदारी को और भी कठिन बना सकती है।

अब सभी की नज़र सुप्रीम कोर्ट पर है, जो इस मामले पर सुनवाई करेगा और तय करेगा कि क्या चुनाव आयोग का आदेश संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं। इस फैसले का न केवल बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों पर बल्कि पूरे देश में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

लेखक

  • Nalini Mishra

    नलिनी मिश्रा: डिजिटल सामग्री प्रबंधन में विशेषज्ञता

    नलिनी मिश्रा डिजिटल सामग्री प्रबंधन की एक अनुभवी पेशेवर हैं। वह डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में कुशलतापूर्वक काम करती हैं और कंटेंट स्ट्रैटेजी, क्रिएशन, और प्रबंधन में विशेषज्ञता रखती हैं

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नलिनी मिश्रा

नलिनी मिश्रा: डिजिटल सामग्री प्रबंधन में विशेषज्ञतानलिनी मिश्रा डिजिटल सामग्री प्रबंधन की एक अनुभवी पेशेवर हैं। वह डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में कुशलतापूर्वक काम करती हैं और कंटेंट स्ट्रैटेजी, क्रिएशन, और प्रबंधन में विशेषज्ञता रखती हैं

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