बिहार चुनाव के बीच वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने वंशवाद पर बड़ा बयान देकर सियासी बहस तेज कर दी है। थरूर ने कहा कि वंशवादी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है और अब समय आ गया है कि देश वंश के बजाय योग्यता (merit) को तरजीह दे। उनका तर्क है कि जब राजनीतिक शक्ति का निर्धारण योग्यता, प्रतिबद्धता और जमीनी जुड़ाव के बजाय खानदानी पहचान से होने लगे, तो शासन की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है।
थरूर के इस बयान को बिहार की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की जोड़ी लंबे समय से केंद्र में रही है। फिलहाल तेजस्वी महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं और राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेतृत्व ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। ऐसे में थरूर की टिप्पणी कांग्रेस के लिए असहज सवाल खड़े कर सकती है और चुनावी समर में नई बहस छेड़ सकती है।
पहली बार नहीं, पार्टी लाइन से अलग सुर
यह पहली बार नहीं है जब शशि थरूर ने पार्टी लाइन से अलग राय रखी हो। इससे पहले भी वे भारत-पाकिस्तान संघर्ष और पहलगाम हमले के बाद राजनयिक प्रयासों पर अपनी टिप्पणियों को लेकर चर्चा में रहे हैं। तब भी उनकी बातें कांग्रेस के आधिकारिक रुख से अलग मानी गईं और कुछ नेताओं ने उन पर सवाल उठाए थे।
लेख में क्या लिखा: “Indian Politics Are a Family Business”
थरूर ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन ‘प्रोजेक्ट सिंडिकेट’ के लिए “Indian Politics Are a Family Business” शीर्षक से लेख लिखा है। तिरुवनंतपुरम के सांसद ने इसमें कहा कि दशकों से एक परिवार भारतीय राजनीति पर प्रभावशाली रहा है और नेहरू-गांधी परिवार का योगदान स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से जुड़ा है। लेकिन इसके साथ ही भारतीय राजनीति में यह धारणा भी मजबूत हुई है कि नेतृत्व किसी का जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है—और यही विचार अलग-अलग पार्टियों, राज्यों और स्तरों पर देखने को मिलता है।
उदाहरणों से समझाया वंशवाद
थरूर ने कई राज्यों की मिसालें देते हुए कहा कि बीजू पटनायक के निधन के बाद उनके बेटे नवीन पटनायक ने पिता की खाली लोकसभा सीट जीती और आगे चलकर ओडिशा की राजनीति के बड़े चेहरा बने। महाराष्ट्र में शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे से नेतृत्व उद्धव ठाकरे तक पहुंचा और अब उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे भी सक्रिय हैं। समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, और आज वे पार्टी अध्यक्ष तथा सांसद हैं। बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के बाद उनके बेटे चिराग पासवान ने कमान संभाली।
उन्होंने यह भी कहा कि यह चलन सिर्फ कुछ बड़े परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्राम सभाओं से लेकर संसद तक सत्ता संरचना के ताने-बाने में गहराई से समाया है। जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी वंशवादी राजनीति के उदाहरण खूब मिलते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप तक फैला पैटर्न
थरूर लिखते हैं कि वंशवाद का यह पैटर्न पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में दिखता है। पाकिस्तान में भुट्टो और शरीफ परिवार, बांग्लादेश में शेख और ज़िया परिवार, और श्रीलंका में भंडारनायके तथा राजपक्षे परिवार—ये सभी बताती हैं कि यह ट्रेंड क्षेत्रीय राजनीति में कितना गहरा बैठा है।
लोकतंत्र बनाम ‘ब्रांड फैमिली’
थरूर के मुताबिक वंशवाद भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता। फिर भी यह मॉडल इसलिए टिकता है क्योंकि एक परिवार समय के साथ ‘ब्रांड’ बन जाता है। मतदाता यदि पिता, चाचा या भाई-बहन के नाम पर भरोसा कर चुके हैं, तो उसी नाम से उतरे नए चेहरे को भी आसानी से स्वीकार कर लेते हैं—उसे अलग से विश्वसनीयता साबित नहीं करनी पड़ती। यही वजह है कि योग्यता और प्रदर्शन के बजाय खानदानी पहचान अक्सर टिकट और ताज दोनों तय कर देती है, जो अंततः शासन-प्रशासन की गुणवत्ता पर चोट करता है।
बिहार चुनावी सीन पर क्या असर?
थरूर का यह लेख ऐसे समय आया है जब बिहार में तेजस्वी यादव महागठबंधन के सीएम चेहरे के तौर पर प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा है और उसने तेजस्वी की दावेदारी पर सवाल नहीं उठाए। ऐसे में थरूर का “वंशवाद बनाम योग्यता” वाला सार्वजनिक तर्क विपक्षी खेमे के भीतर विमर्श को नया मोड़ दे सकता है और सियासी बयानबाज़ी को और धारदार बना सकता है। कुल मिलाकर, थरूर की दलील योग्यता-आधारित नेतृत्व की मांग को आगे बढ़ाती है और वंशवादी राजनीति को भारतीय लोकतंत्र के लिए “गंभीर खतरा” बताती है—इसी पर बहस अब बिहार की गलियों से लेकर दिल्ली के गलियारों तक गूंजने वाली है।








