सऊदी-पाक डिफेंस डील: सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई नई डिफेंस डील ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ये समझौता किसके फायदे में है और भारत की सुरक्षा पर इसका कितना असर पड़ सकता है?
सऊदी-पाक डिफेंस डील – क्यों है ये डील खास?
रियाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के बीच स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट पर साइन हुए। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यानी अब पाकिस्तान और सऊदी अरब एक-दूसरे की सुरक्षा की गारंटी बन गए हैं।
समझौते में न्यूक्लियर हथियारों से लेकर सभी सैन्य साधनों तक का इस्तेमाल शामिल है। ये डील जुलाई 2025 में हुए एक MoU के बाद सामने आई, जिसमें पाकिस्तान ने सऊदी अरब को 38 बिलियन डॉलर के रक्षा निवेश का भरोसा दिलाया था।
दशकों पुराना रिश्ता
पाकिस्तान और सऊदी अरब का रिश्ता नया नहीं है। दोनों देशों ने हमेशा सैन्य और आर्थिक सहयोग में एक-दूसरे का साथ दिया है।
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1980-88: ईरान-इराक युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने वादा किया था कि सऊदी पर हमला पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा।
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2020: सऊदी ने पाकिस्तान को 1 बिलियन डॉलर का डिपॉजिट बढ़ाया और संयुक्त अभ्यास अल-सम्साम जारी रखा।
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2021: कोविड महामारी के समय 3 बिलियन डॉलर का तेल कर्ज दिया गया और पाक सेना ने सऊदी गार्ड्स को ट्रेनिंग दी।
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2022: JF-17 थंडर जेट्स की सप्लाई और डिफेंस MoU साइन हुए।
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2023: इजरायल-हमास युद्ध के बीच 2 बिलियन डॉलर की मदद दी गई और अल-सम्साम 10 अभ्यास में 5000 पाकिस्तानी सैनिक उतरे।
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2024: 3 बिलियन डॉलर का डिपॉजिट रिन्यू हुआ और पाकिस्तानी मिसाइल सिस्टम्स की खरीद पर बात हुई।
यानी पाकिस्तान के लिए सऊदी हमेशा आर्थिक ऑक्सीजन टैंक की तरह रहा है।
क्यों लपका सऊदी अरब?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका पर भरोसा कम होने के बाद सऊदी ने पाकिस्तान का हाथ थामा है। हाल ही में इजरायल-कतर संघर्ष में अमेरिका ने जिस तरह से सीमित समर्थन दिया, उससे सऊदी अरब का भरोसा हिला। ईरान और इजरायल जैसे दुश्मनों से घिरा सऊदी अब पाकिस्तान के न्यूक्लियर छाते को अपनी सुरक्षा मान रहा है।
भारत को खतरा या नहीं?
भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इस डील से भारत को सीधे तौर पर खतरा नहीं है। अतीत गवाह है कि सऊदी अरब ने कभी भी भारत के खिलाफ अपनी सेना नहीं भेजी, न ही पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क को खुला समर्थन दिया। उल्टा, भारत और सऊदी के रिश्ते ऊर्जा और व्यापार पर आधारित हमेशा मजबूत बने रहे हैं।
यानी पाकिस्तान को भले ही सैन्य सहयोग का सपना दिखे, लेकिन सऊदी का असली मकसद अपनी सुरक्षा है, न कि भारत के खिलाफ कोई मोर्चा खोलना।
पाकिस्तान का फायदा क्या?
पाकिस्तान की टूटी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए यह डील वरदान है। शहबाज शरीफ जानते हैं कि सऊदी के पास पैसों की कमी नहीं है। इसलिए उन्होंने न्यूक्लियर हथियारों की सुरक्षा का कार्ड खेलकर अरब निवेश और मदद पक्की कर ली।
इस तरह पाकिस्तान अपने “इस्लामिक बम” की ताकत दिखाकर सऊदी से मोटी रकम, निवेश और डिफेंस डील्स हासिल कर रहा है। वहीं सऊदी अरब को अमेरिका पर निर्भरता घटाकर एक इस्लामी सहयोगी मिल गया।
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