सावधान! राजस्थान में गेहूं की बंपर बुवाई के बाद भी किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें, कहीं आपकी फसल भी तो नहीं हो रही खराब?

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दौसा, राजस्थान: राजस्थान के खेतों में इस बार रबी की फसलों की हरियाली तो दिख रही है, लेकिन किसानों के चेहरों पर वो चमक गायब है जो बंपर पैदावार की उम्मीद में होती है। दौसा जिले सहित राज्य के कई हिस्सों में गेहूं, जौ और सरसों की बुवाई तो रिकॉर्ड स्तर पर हुई है, लेकिन कुदरत के बदलते मिजाज ने अन्नदाताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। आखिर क्या वजह है कि अच्छी बारिश और नमी के बावजूद किसान अपनी ही फसल को उखाड़ने पर मजबूर हो रहे हैं? आइए जानते हैं पूरी ग्राउंड रिपोर्ट।

मानसून की मेहरबानी पड़ी भारी?

इस साल मानसून की विदाई के समय हुई आखिरी बारिश ने खेतों में अच्छी-खासी नमी छोड़ दी थी। इस नमी को देखकर दौसा के किसानों के चेहरे खिल गए। उन्हें लगा कि बिना ज्यादा सिंचाई के ही इस बार अच्छी फसल हाथ लग जाएगी। इसी लालच और बिजली-डीजल का खर्च बचाने के चक्कर में लगभग 11 हजार हेक्टेयर में किसानों ने अक्टूबर के मध्य तक ही गेहूं की अगेती (Early) बुवाई कर दी।

यह बुवाई सामान्य समय से करीब एक महीने पहले थी। शुरुआत में अंकुरण (Germination) तो बहुत शानदार हुआ, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, मौसम ने दगा दे दिया।

गर्मी ने बिगाड़ा खेल: समय से पहले निकल आए ‘कल्ले’

रबी की फसल, खासकर गेहूं और जौ के लिए दिसंबर की कड़ाके की ठंड, कोहरा और धुंध किसी वरदान से कम नहीं होती। लेकिन इस बार दिसंबर में भी तापमान 20 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहा।

इसका नतीजा क्या हुआ?

किसान की जुबानी: “फसल उखाड़ने की आ गई नौबत”

भंडाना के रहने वाले किसान मनोहर लाल शर्मा बताते हैं, “खेतों में नमी अच्छी थी, तो हमने सोचा कि जल्दी बुवाई कर देते हैं। इससे श्रम और पानी बचेगा। लेकिन गर्मी ने सब चौपट कर दिया। फसल समय से पहले ही बड़ी दिखने लगी है और उसमें वो मजबूती नहीं है जो ठंड में आती है। हालत ये है कि कई साथियों ने तो खड़ी फसल को हटाकर अब दोबारा बुवाई शुरू की है।”

बुवाई का सही गणित: क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं की पैदावार के लिए टाइमिंग का सही होना सबसे जरूरी है।

आंकड़ों की नजर से: गेहूं घटा, सरसों और चना बढ़ा

कृषि विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, किसानों के रुझान में भी बदलाव आया है। वर्ष 2024-25 की तुलना में इस बार गेहूं की बुवाई का रकबा करीब 6,900 हेक्टेयर कम हुआ है। इसके उलट, किसानों ने सरसों और चना पर ज्यादा भरोसा जताया है, जिसका रकबा 5,365 हेक्टेयर बढ़ गया है। विभाग ने गेहूं-जौ के लिए 80,000 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा था, जिसके मुकाबले 88,200 हेक्टेयर में बुवाई हुई है।

क्या अब भी है कोई उम्मीद?

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि करीब 15 प्रतिशत किसानों ने अगेती बुवाई की थी, जिन्हें नुकसान का खतरा ज्यादा है। हालांकि, अगर जनवरी के पहले हफ्ते में अच्छी ठंड और कोहरा पड़ता है, तो नुकसान की भरपाई कुछ हद तक संभव है। विभाग लगातार किसानों को सलाह दे रहा है कि वे अपनी मर्जी से बुवाई करने के बजाय वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए समय और खाद-बीज का ही पालन करें।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से एकत्रित की गई है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस जानकारी को उपलब्ध स्रोतों से सत्यापित करें।

लेखक

  • दिव्यांशु शोध-लेखन के प्रति बेहद जुनूनी हैं।
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