नई दिल्ली/लंदन: सोचिए, क्या कोई 20 या 30 मंजिला इमारत पूरी तरह से लकड़ी की बनी हो सकती है? सुनने में यह किसी पुरानी फिल्म के सीन जैसा लग सकता है, लेकिन साल 2025 में यह हकीकत बन चुका है। कंस्ट्रक्शन की दुनिया में इन दिनों एक शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा है— ‘मास टिम्बर’ (Mass Timber)। दावा किया जा रहा है कि आने वाले समय में यह तकनीक ईंट, सीमेंट और लोहे के सरिए की जगह ले सकती है।
लेकिन क्या लकड़ी की इमारतें उतनी ही मजबूत होती हैं? क्या इनमें आग लगने का डर नहीं रहता? आइए समझते हैं इस ‘सुपर-वुड’ का पूरा गणित।
आखिर क्या है यह ‘Mass Timber’ बला?
साधारण लकड़ी और ‘मास टिम्बर’ में बहुत बड़ा अंतर है। यह कोई आम प्लाईवुड या फर्नीचर वाली लकड़ी नहीं है। इसमें लकड़ी की कई परतों को एक के ऊपर एक खास दिशा में रखकर बेहद शक्तिशाली गोंद (Adhesives) के साथ हाइड्रोलिक प्रेस के नीचे दबाया जाता है। इससे तैयार होते हैं ‘क्रॉस लैमिनेटेड टिम्बर’ (CLT) और ‘ग्लुलम’ (Glulam) जैसे पैनल।
ये पैनल इतने मजबूत होते हैं कि इनकी ताकत स्टील और कंक्रीट के बराबर मानी जाती है, लेकिन इनका वजन उनसे काफी कम होता है। बड़े-बड़े आर्किटेक्ट्स का मानना है कि यह तकनीक इमारतों को ‘लेगो ब्लॉक्स’ की तरह जोड़ने जैसा आसान बना देती है।
लोहे और कंक्रीट से बेहतर क्यों?
अब आप सोच रहे होंगे कि जब हमारे पास सीमेंट और लोहा है, तो लकड़ी की तरफ क्यों मुड़ें? इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं:
पर्यावरण का दोस्त: सीमेंट और स्टील बनाने में भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके उलट, पेड़ कार्बन सोखते हैं। मास टिम्बर का इस्तेमाल करने का मतलब है कि आप कार्बन को इमारत के अंदर ‘कैद’ कर रहे हैं।
काम में सुपर स्पीड: कंक्रीट को सूखने और जमने में हफ़्तों लगते हैं। मास टिम्बर के पैनल फैक्ट्री में बनकर आते हैं और साइट पर उन्हें बस नट-बोल्ट से कसना होता है। इससे निर्माण का समय 25% से 30% तक कम हो जाता है।
हल्का और भूकंप रोधी: लकड़ी कंक्रीट से बहुत हल्की होती है। भूकंप आने पर हल्की इमारतें कम हिलती हैं और उनके गिरने का खतरा काफी कम हो जाता है।
सबसे बड़ा डर: क्या आग नहीं लगेगी?
जब भी लकड़ी के घर की बात आती है, तो सबसे पहले दिमाग में ‘आग’ का ख्याल आता है। लेकिन इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि मास टिम्बर असल में आग के प्रति बहुत सुरक्षित है।
जब भारी लकड़ी में आग लगती है, तो उसकी बाहरी परत जलकर ‘कोयला’ (Char) बन जाती है। यह कोयले की परत अंदर की लकड़ी के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है और आग को अंदर नहीं पहुंचने देती। रिसर्च में पाया गया है कि भीषण आग के दौरान लोहे के सरिए पिघलकर मुड़ सकते हैं, लेकिन मास टिम्बर का ढांचा घंटों तक टिका रह सकता है।
दुनियाभर में मच रहा है शोर
नॉर्वे, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पहले ही लकड़ी की ऊंची इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। अमेरिका के मिल्वौकी में ‘एसेंट’ (Ascent) नाम की 25 मंजिला इमारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत में भी अब इस पर बहस शुरू हो गई है। बेंगलुरु और पुणे जैसे शहरों में कुछ स्टार्टअप्स और आर्किटेक्ट्स मास टिम्बर के छोटे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं
इतना सब सुनने के बाद लगता है कि कल से ही लकड़ी के घर बनने लगेंगे, लेकिन इसकी राह में कुछ मुश्किलें भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती है— कीमत। भारत जैसे देश में जहां लकड़ी महंगी है और अच्छी क्वालिटी के टिम्बर की कमी है, वहां इसका खर्च सीमेंट से ज्यादा बैठ सकता है। इसके अलावा, लोगों का भरोसा जीतना भी एक बड़ा टास्क है।
निष्कर्ष: बदलते दौर में जब ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बनी है, ‘मास टिम्बर’ एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। यह सिर्फ एक कंस्ट्रक्शन स्टाइल नहीं, बल्कि भविष्य के शहरों को बचाने की एक कोशिश है।
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