नई दिल्ली: अध्यात्म की दुनिया में ‘ओशो’ (Osho) एक ऐसा नाम है जिसे कोई भूल नहीं सकता, लेकिन उनके साथ एक और नाम साये की तरह जुड़ा रहा— मां आनंद शीला (Maa Anand Sheela)। कभी ओशो की सबसे करीबी और उनके साम्राज्य की सर्वेसर्वा रही शीला आज एक बार फिर चर्चा में हैं। नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘वाइल्ड वाइल्ड कंट्री’ के बाद दुनिया ने उन्हें एक ‘खलनायिका’ के रूप में देखा, लेकिन हाल ही में आई डॉक्यूमेंट्री ‘मूविंग माउंटेन’ (Moving Mountains) ने उनके जीवन के एक अलग पहलू को सामने रखा है।
राजनीशपुरम की ‘रानी’ से कैदी नंबर 151 तक का सफर
80 के दशक में जब आचार्य रजनीश (ओशो) ने अमेरिका के ओरेगन में 64,000 एकड़ जमीन पर अपना ‘पवित्र शहर’ बसाया, तो उसकी कमान मां आनंद शीला के हाथों में थी। वह ओशो की सचिव थीं और उनके पास वो ताकत थी जिससे अमेरिकी सरकार भी कांपती थी। 93 रॉल्स रॉयस कारों का काफिला और हजारों समर्थकों की फौज संभालने वाली शीला की जिंदगी में मोड़ तब आया, जब उन पर बायो-टेरर अटैक और हत्या की साजिश के आरोप लगे।
शीला को 1985 में अमेरिका छोड़ना पड़ा, जर्मनी में गिरफ्तारी हुई और फिर उन्हें जेल भेज दिया गया। ओशो ने खुद उन पर धोखेबाजी के आरोप लगाए। लेकिन शीला का कहना है कि उन्होंने जो कुछ भी किया, वो सिर्फ ‘प्यार’ में किया।
अब कहां हैं मां आनंद शीला?
जेल से रिहा होने के बाद मां आनंद शीला ने अपनी पूरी पहचान बदल ली। आज वह स्विट्जरलैंड के एक छोटे से गांव मैसप्राच (Maisprach) में रहती हैं। लेकिन उनकी जिंदगी अब लग्जरी कारों और आलीशान आश्रमों के बारे में नहीं है। वह वहां ‘मातृसदन’ (Matrusaden) नाम से दो केयर होम चलाती हैं, जहां वह उन बुजुर्गों और मरीजों की सेवा करती हैं जिन्हें समाज ने छोड़ दिया है।
70 की उम्र पार कर चुकीं शीला कहती हैं, “मैंने रानी की तरह जिंदगी जी है और अब मैं एक दासी की तरह सेवा कर रही हूं। मुझे अपने अतीत पर कोई पछतावा नहीं है।”
फिल्म और बायोपिक को लेकर मची रार
मां आनंद शीला की जिंदगी इतनी फिल्मी है कि बॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्रियां उनका किरदार निभाना चाहती हैं। प्रियंका चोपड़ा ने जब उनकी बायोपिक का एलान किया था, तो शीला ने उन्हें लीगल नोटिस भेज दिया था। शीला का मानना है कि आलिया भट्ट उनकी भूमिका के लिए सबसे फिट हैं क्योंकि उनमें वही ‘स्पंक’ और ‘शरारत’ है जो जवानी के दिनों में शीला में थी।
क्या आज भी ओशो से प्यार करती हैं शीला?
एक हालिया इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें ओशो से अब भी कोई लगाव है, तो उन्होंने बेबाकी से कहा, “प्यार कभी खत्म नहीं होता। ओशो ने मुझे जो सिखाया, वो मेरे साथ है। भले ही उन्होंने मुझ पर आरोप लगाए, लेकिन मेरा प्यार आज भी वही है।” उनके इस अंदाज़ ने सोशल मीडिया पर फिर से बहस छेड़ दी है कि वह एक मास्टरमाइंड थीं या सिर्फ एक समर्पित शिष्या।
मां आनंद शीला की कहानी हमें सिखाती है कि सत्ता और पावर कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंत में सुकून दूसरों की सेवा में ही मिलता है। आज वह भले ही ओशो के ‘राजनीशपुरम’ से दूर हों, लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने का उनका हुनर आज भी बरकरार है।
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