झारखंड में ‘खेला’ तय? हेमंत सोरेन–BJP नजदीकियों की असली कहानी क्या है

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Jharkhand की सियासत इन दिनों उबाल पर है। रांची से लेकर दिल्ली तक एक ही सवाल हवा में तैर रहा है—क्या सच में हेमंत सोरेन की पार्टी जेएमएम, बीजेपी के साथ हाथ मिला सकती है? हाल ही में हेमंत सोरेन का अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ दिल्ली दौरा और उसी समय झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की अमित शाह से मुलाकात… ये सब यूं ही संयोग नहीं लग रहे। राजनीति में टाइमिंग अक्सर कहानी का असली प्लॉट खोलती है, और फिलहाल झारखंड में कुछ बड़ा पक रहा है, यह बात शायद ही कोई नकार सके।

बिहार चुनाव खत्म होते ही झारखंड अचानक राष्ट्रीय सियासत के फोकस में आ गया है। महागठबंधन की बिहार में करारी हार ने इंडिया गठबंधन के भीतर खटास और ज्यादा गहरी कर दी है। सूत्र बताते हैं कि जेएमएम के रिश्ते राजद और कांग्रेस से लगातार बिगड़ रहे हैं। इसी वजह से जेएमएम–बीजेपी के संभावित गठबंधन की चर्चा बेहद तेजी से फैल रही है। दावा तो यहां तक है कि हेमंत सोरेन खुद बीजेपी से संपर्क में हैं, हालांकि जेएमएम इसे सिरे से नकार रहा है।

संख्याओं का खेल और नया संभावित समीकरण

झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं और बहुमत का आंकड़ा है 41 का। फिलहाल सत्ता में मौजूद इंडिया गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं—जेएमएम के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और वामपंथी दलों के 2।
लेकिन नया समीकरण अगर बनता है, तो आंकड़ा अचानक 58 तक पहुंच सकता है:

यानी बहुमत से काफी ऊपर। यही वजह है कि ‘गठबंधन बदलेगा क्या?’—यह सवाल अब सिर्फ अटकल नहीं बल्कि गंभीर राजनीतिक चर्चा बन चुका है।

अटकलों के पीछे की असली वजहें क्या हैं?

पिछले कुछ दिनों से हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन दिल्ली में मौजूद हैं। इसे भले निजी यात्रा बताया गया हो, लेकिन सियासी गलियारों में इसे महज इत्तेफाक नहीं माना जा रहा।
दूसरी ओर राज्यपाल की अमित शाह से मुलाकात ने शक के बादल और ज्यादा घने कर दिए।
इंडिया गठबंधन में पहले से ही खटास थी, बिहार की हार ने उसे और चौड़ा कर दिया।
हेमंत सोरेन पहले ही ईडी की जांच का सामना कर रहे हैं, जमीन घोटाला केस में वे जेल भी जा चुके हैं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।
इन स्थितियों ने राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है।

गठबंधन कहां से टूटा? बिहार से शुरू हुई कहानी

बिहार चुनाव के दौरान जेएमएम ने महागठबंधन से 7 सीटों की मांग की थी। हेमंत सोरेन चाहते थे कि वे अपनी पार्टी के सिंबल पर उम्मीदवार उतारें, लेकिन तेजस्वी यादव ने यह मांग ठुकरा दी।
जेएमएम को चकाई, धमदाहा, कटोरिया, पिरपैंती, मनीहारी, जमुई और एक और बॉर्डर सीट चाहिए थी—लेकिन बात बनी नहीं।
इसके बाद जेएमएम ने बिहार में महागठबंधन से दूरी बना ली और पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा था कि “अब हम झारखंड में भी गठबंधन की समीक्षा करेंगे।”
यहीं से दरार शुरू हुई, जो अब झारखंड तक पहुंच चुकी है।

क्या वाकई राजद-कांग्रेस से दूरी बढ़ रही है?

सूत्र बताते हैं कि कई कैबिनेट बैठकों में कांग्रेस व राजद के मंत्रियों से हेमंत सोरेन की बातचीत तक नहीं हुई।
कई सरकारी कार्यक्रम या तो कैंसिल हुए या फिर सीएम उपस्थित नहीं हुए।
हाल ही में मोराबादी मैदान में नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम में कांग्रेस-राजद नेताओं की तस्वीरें गायब थीं।
दुमका के कार्यक्रम में भी महागठबंधन के मंत्री नदारद रहे।
इन सबने इस चर्चा को और गर्म कर दिया है कि “झारखंड में खेला होबे” वाली स्थिति बन चुकी है।

अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से एकत्रित की गई है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस जानकारी को उपलब्ध स्रोतों से सत्यापित करें।

लेखक

  • दिव्यांशु शोध-लेखन के प्रति बेहद जुनूनी हैं।
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