पुणे: भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने बेबाक अंदाज और कूटनीतिक सूझबूझ के लिए जाने जाते हैं। एक बार फिर उन्होंने वैश्विक मंच से दुनिया के शक्तिशाली देशों को कड़ा संदेश दिया है। पुणे में सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के 22वें दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए जयशंकर ने साफ कहा कि अब वो दौर चला गया जब कोई एक देश पूरी दुनिया पर अपनी मर्जी थोपता था। उनके मुताबिक, अब “पावर” के मायने पूरी तरह बदल चुके हैं।
ताकत का नया सेंटर: अब एक नहीं, कई हैं ‘बॉस’
जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया में आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदल गया है। अब दुनिया एक-ध्रुवीय (Unipolar) नहीं रही, बल्कि इसमें ताकत के कई केंद्र उभर आए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, “आज वैश्विक स्तर पर प्रभाव के कई केंद्र हैं। कोई भी देश, चाहे वह खुद को कितना ही बड़ा और शक्तिशाली क्यों न समझे, वह हर मुद्दे पर अपनी इच्छा दूसरों पर नहीं थोप सकता।”
अमेरिका, चीन और रूस: रिश्तों की नई पेचीदगियां
विदेश मंत्री ने वैश्विक चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि आज के दौर में बड़े देशों के साथ तालमेल बिठाना पहले जैसा आसान नहीं रहा। उन्होंने तीन बड़े मोर्चों का उदाहरण दिया:
अमेरिका: जयशंकर के मुताबिक, अमेरिका के साथ संवाद और जुड़ाव अब पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो गया है।
चीन: पड़ोसी देश चीन से निपटना अब एक बड़ी और पेचीदा चुनौती बन चुका है।
रूस: यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के साथ संतुलन बनाना मुश्किल हुआ है, क्योंकि भारत पर लगातार रूस से दूरी बनाने का वैश्विक दबाव डाला जा रहा है।
सिर्फ सेना नहीं, ‘टैलेंट’ भी है अब असली पावर
जयशंकर ने पावर की एक नई परिभाषा पेश की। उन्होंने कहा कि आज ताकत का मतलब सिर्फ टैंक, मिसाइल या बड़ी सेना नहीं है। आज की पावर व्यापार, ऊर्जा, सैन्य क्षमता, प्राकृतिक संसाधन, अत्याधुनिक तकनीक और मानव प्रतिभा (Human Talent) में छिपी है। यही कारण है कि आज की ग्लोबल पॉलिटिक्स को समझना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है।
पड़ोसियों के लिए ‘संकटमोचन’ बना भारत
अपने संबोधन में उन्होंने भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी का जिक्र करते हुए भावुक उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोसी देश आकार में छोटे हैं और वहां की घरेलू राजनीति में भारत हमेशा एक बड़ा मुद्दा रहता है। लेकिन संकट के समय भारत ही सबसे पहले खड़ा होता है।
“पिछले हफ्ते श्रीलंका में चक्रवात आया और हम उसी दिन मदद लेकर पहुंच गए। कोविड के समय वैक्सीन हो या यूक्रेन युद्ध के दौरान पेट्रोल और अनाज की किल्लत, भारत ने हमेशा अपने पड़ोसियों का हाथ थामा है।”
खाड़ी देशों से पुराना रिश्ता और ‘विभाजन’ का दर्द
प्रधानमंत्री मोदी की ओमान यात्रा का जिक्र करते हुए जयशंकर ने कहा कि खाड़ी देशों के साथ हमारा रिश्ता सदियों पुराना है। उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि विभाजन के बाद “कोई बीच में आ गया” (पाकिस्तान की ओर इशारा), जिससे दूरियां बढ़ गईं। अब भारत उस भावनात्मक और व्यापारिक जुड़ाव को फिर से जिंदा कर रहा है।
छात्रों से अपील: भारत की छाप को पहचानें
जयशंकर ने युवाओं से कहा कि वे दुनिया में जहां भी जाएं, वहां भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को जरूर तलाशें। उन्होंने याद दिलाया कि दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भारत में नहीं, बल्कि कंबोडिया (अंकोरवाट) में है। उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि विदेश नीति और जीवन में हमेशा एक स्पष्ट ‘गेम प्लान’ और ठोस रणनीति के साथ आगे बढ़ें।
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