नई दिल्ली/ढाका: भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले कुछ समय से कूटनीतिक गलियारों में भले ही तल्खी दिख रही हो, लेकिन जब बात देश की जनता का पेट भरने और अर्थव्यवस्था की आती है, तो पड़ोसी देश बांग्लादेश को आज भी भारत ही सबसे भरोसेमंद साथी नजर आता है। हालिया घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर ‘इंडिया आउट’ के चाहे जितने नारे लगें, लेकिन हकीकत की जमीन पर बांग्लादेश भारत के बिना बेबस है।
ताजा मामला चावल की खरीद से जुड़ा है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत से 50,000 टन चावल खरीदने का बड़ा फैसला किया है। चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेश ने यह कदम तब उठाया है जब वह पाकिस्तान से भी चावल खरीद रहा है, लेकिन पाकिस्तान ने उसे जो ‘चूना’ लगाया है, उसने यूनुस सरकार की आंखें खोल दी हैं।
पाकिस्तान पड़ा महंगा, भारत ने निभाई दोस्ती
मीडिया रिपोर्ट्स, विशेषकर ‘द डेली स्टार’ के मुताबिक, बांग्लादेश को भारत से मिलने वाला चावल पाकिस्तान के मुकाबले कहीं ज्यादा सस्ता पड़ रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पाकिस्तान ने बांग्लादेश को 395 डॉलर (करीब ₹35,374) प्रति टन के भाव पर चावल देने का सौदा किया है। वहीं, भारत ने मुश्किल वक्त में बड़े भाई का फर्ज निभाते हुए यही चावल महज 355 डॉलर (करीब ₹31,792) प्रति टन में देने का फैसला किया है।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारत से चावल खरीदने पर बांग्लादेश को हर एक टन पर 40 डॉलर की भारी बचत हो रही है। अगर 50,000 टन की पूरी खेप को देखें, तो बांग्लादेश को भारत के साथ डील करने पर करीब 18 करोड़ रुपये (20 लाख डॉलर) का सीधा फायदा हो रहा है।
राजनीति अपनी जगह, व्यापार अपनी जगह
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे व्यापारिक फैसलों को राजनीति की भेंट नहीं चढ़ने देंगे। बांग्लादेश के वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने साफ तौर पर कहा कि महंगे विकल्पों को चुनना समझदारी नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि अगर वे भारत के बजाय वियतनाम या किसी अन्य देश की ओर देखते, तो उन्हें प्रति किलो और भी अधिक कीमत चुकानी पड़ती।
तनाव के बीच भी भारत का बड़ा दिल
अगस्त में तख्तापलट और शेख हसीना के भारत आने के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में 1971 के बाद की सबसे बड़ी कड़वाहट देखी जा रही है। दूतावासों पर प्रदर्शन और तीखी बयानबाजी के बावजूद भारत ने खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कड़ा रुख नहीं अपनाया। न तो सप्लाई रोकी गई और न ही कीमतें बढ़ाकर फायदा उठाने की कोशिश की गई।
वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने संकेत दिया कि मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस भारत के साथ रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी माना कि कुछ बाहरी तत्व जानबूझकर भारत-विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो खुद बांग्लादेश के हित में नहीं है।
क्या कहते हैं जानकार?
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति इस वक्त नाजुक है। ऐसे में पाकिस्तान जैसे देश, जो खुद आर्थिक बदहाली से जूझ रहे हैं, बांग्लादेश की मदद करने के बजाय उसे महंगे दामों पर सामान बेच रहे हैं। वहीं भारत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की नीति पर कायम है। राजनीति में भले ही दूरियां हों, लेकिन संकट के समय भारत ने हमेशा पड़ोसी का साथ दिया है।
कुल मिलाकर, ढाका ने यह समझ लिया है कि नारों से पेट नहीं भरता और बाजार की हकीकत में भारत का कोई विकल्प नहीं है।
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