कीचड़, कीड़े और AK-47 का साया: 50 लाख गंवाकर मौत के मुंह से लौटा हरियाणा का लाल, डंकी रूट की रूह कंपा देने वाली कहानी

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कुरुक्षेत्र: अमेरिका जाकर डॉलर कमाने का सपना आज हरियाणा और पंजाब के युवाओं के सिर चढ़कर बोल रहा है। लेकिन इस ‘सुनहरे सपने’ के पीछे जो खौफनाक हकीकत छिपी है, उसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। कुरुक्षेत्र के उमरी गांव के रहने वाले योगेश की कहानी उन हजारों युवाओं के लिए एक चेतावनी है जो अवैध तरीके यानी ‘डंकी रूट’ से अमेरिका जाने का जोखिम उठाते हैं। योगेश ने 50 लाख रुपये भी गंवाए, 168 दिनों तक नरक जैसे हालात झेले और अंत में उसे डिपोर्ट कर भारत वापस भेज दिया गया।

50 लाख का सौदा और धोखे की शुरुआत

योगेश के मुताबिक, जुलाई 2024 में करनाल के तीन एजेंटों—अंकित चौधरी, विकास और गुरी ने उसे अपने झांसे में लिया। उन्होंने खुद को सरकारी एजेंट बताया और वादा किया कि वे उसे कानूनी तरीके से अमेरिका भेजकर वहां पक्की नौकरी दिलवाएंगे। सौदा 50 लाख रुपये में तय हुआ, जिसमें टिकट, बीमा और नौकरी की गारंटी शामिल थी। योगेश के परिवार ने 15 लाख रुपये एडवांस के तौर पर दे दिए।

ब्राजील में गिरफ्तारी और फिरौती का खेल

सफर 26 जुलाई को दिल्ली एयरपोर्ट से शुरू हुआ। एजेंटों ने योगेश को ब्राजील के बीजल एयरपोर्ट पर उतार दिया, जहां उसे अवैध प्रवेश के आरोप में कस्टडी में ले लिया गया। यहां से एजेंटों का असली खेल शुरू हुआ। योगेश को छुड़ाने के नाम पर उसके परिवार से फिर 15 लाख रुपये वसूले गए। करीब डेढ़ महीने तक उसे ब्राजील में इधर-उधर घुमाया गया और अंत में जंगलों के रास्ते अमेरिका भेजने का खौफनाक प्लान बनाया गया।

पनामा के जंगल: जहां मौत हर कदम पर थी

ब्राजील से योगेश को कार के जरिए बोलीविया, पेरू, इक्वाडोर और फिर कोलंबिया ले जाया गया। असली परीक्षा पनामा के जंगलों में शुरू हुई। योगेश ने बताया कि एक 4-सीटर गाड़ी में 10-10 लोगों को ठूंसकर ले जाया जाता था। खिड़की खोलने तक की मनाही थी। पनामा के घने जंगलों में उन्हें उन ‘डंकरों’ के हवाले कर दिया गया जिनके हाथों में पिस्टल और AK-47 जैसे खतरनाक हथियार थे।

डंकरों की साफ चेतावनी थी—”चुपचाप साथ चलो, भागने की कोशिश की तो गोली मार देंगे।” दो-दो दिनों तक खाना और पानी नसीब नहीं होता था। भूख लगने पर कभी-कभार सिर्फ उबले हुए चावल मिलते थे और प्यास बुझाने के लिए नदियों का गंदा पानी पीना पड़ता था।

उफनती नदी और 17 घंटे का ‘नरक’

सफर के दौरान योगेश और उसके साथियों को उफनती नदियों के किनारे बारिश में चार-चार रातें बिना छत और कपड़ों के गुजारनी पड़ीं। बैग पहले ही छीन लिए गए थे, शरीर पर सिर्फ फटे-पुराने कपड़े थे। मैक्सिको पहुंचने पर एजेंट के गुर्गों ने बंदूक की नोक पर योगेश के परिवार से 32 लाख रुपये और मांग लिए। डर के मारे परिवार ने वह रकम भी दे दी।

सबसे भयावह मंजर मैक्सिको से अमेरिका बॉर्डर के बीच था। एक छोटे से कंटेनर में 40 से 50 लोगों को भेड़-बकरियों की तरह भर दिया गया। योगेश बताते हैं कि वहां खड़े होने की जगह नहीं थी, सबको 17 घंटे तक ‘उकड़ू’ (पैरों के बल) बैठना पड़ा। सांस लेना भी मुश्किल था, कई लोग बेहोश होने की कगार पर थे।

8 महीने की जेल और डिपोर्टेशन

जैसे ही योगेश ने अमेरिकी सीमा पार की, उसे अमेरिकी सेना ने पकड़ लिया। पास में कोई वैध दस्तावेज नहीं होने के कारण उसे सीधे जेल भेज दिया गया। 8 महीने तक सलाखों के पीछे रहने के बाद, 11 सितंबर को उसे भारत डिपोर्ट कर दिया गया।

आज योगेश के पास न पैसे बचे हैं, न अमेरिका की नौकरी, बस बदन पर पड़े छाले और वो खौफनाक यादें हैं जो उसे सोने नहीं देतीं। पुलिस ने अब एजेंटों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन योगेश का यह अनुभव हर उस युवा के लिए सबक है जो शॉर्टकट के चक्कर में अपनी जान और जमीन दांव पर लगा रहा है।


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लेखक

  • दिव्यांशु शोध-लेखन के प्रति बेहद जुनूनी हैं।
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