अमेरिका की राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल है। हाल ही में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर की गई सैन्य कार्रवाई के बाद डोनाल्ड ट्रंप के तेवर और भी कड़े नजर आ रहे हैं। इस वक्त ट्रंप की नजर दुनिया के कई अहम हिस्सों पर है, जिनमें से एक है— ग्रीनलैंड। बर्फीली वादियों और शांत दिखने वाले इस द्वीप का नाम सुनते ही शायद आपके जेहन में सिर्फ बर्फ और शांति की तस्वीर उभरे, लेकिन इसके इतिहास के पन्नों में एक ऐसा खौफनाक ‘स्कैंडल’ छिपा है, जिसे जानकर आपकी रूह कांप जाएगी।
इसे दुनिया ‘कॉइल स्कैंडल’ (Coil Scandal) के नाम से जानती है। चलिए विस्तार से जानते हैं कि आखिर ग्रीनलैंड के साथ डेनमार्क ने साठ के दशक में ऐसा क्या किया था कि आज भी वहां के लोग सिहर उठते हैं।
क्या है ग्रीनलैंड और क्यों है इस पर विवाद?
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। भौगोलिक रूप से तो यह उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक रूप से इस पर डेनमार्क का राज चलता है। हालांकि ग्रीनलैंड एक स्वायत्त (Autonomous) क्षेत्र है, लेकिन आज भी इसकी रक्षा, विदेश नीति और करेंसी का कंट्रोल डेनमार्क के ही पास है।
साठ के दशक में डेनमार्क को एहसास हुआ कि ग्रीनलैंड संसाधनों के लिहाज से एक ‘हीरा’ है। ग्रीनलैंड आजादी की मांग कर रहा था, लेकिन डेनमार्क इसे छोड़ना नहीं चाहता था। इसी खींचतान के बीच एक ऐसी साजिश रची गई जिसने हजारों महिलाओं का जीवन बर्बाद कर दिया।
‘कॉइल स्कैंडल’: जब मासूम लड़कियों को बनाया गया शिकार
यह मामला 1960 और 70 के दशक का है। डेनिश सरकार को डर था कि अगर ग्रीनलैंड की मूल आबादी (इनुइट लोग) तेजी से बढ़ी, तो उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं का बोझ डेनमार्क पर पड़ेगा। साथ ही, डेनिश लोग खुद को आधुनिक और ग्रीनलैंड के लोगों को पिछड़ा मानते थे।
आबादी को नियंत्रित करने के लिए डेनमार्क ने एक बेहद अमानवीय रास्ता चुना। उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के हजारों इनुइट लड़कियों और महिलाओं के शरीर में जबरन इंट्रायूटरिन डिवाइस (IUD) यानी गर्भनिरोधक कॉइल डलवा दी।
स्कूल जाने वाली बच्चियों को भी नहीं छोड़ा
हैरानी की बात यह है कि इस प्रयोग का निशाना 12 से 15 साल की कम उम्र की लड़कियां भी बनीं। स्कूल के मेडिकल चेकअप के नाम पर डॉक्टरों ने इन बच्चियों के शरीर में कॉइल डाल दी। न तो उन लड़कियों को कुछ बताया गया और न ही उनके माता-पिता से इजाजत ली गई। कइयों को तो यह कहकर डराया गया कि अगर उन्होंने ‘चेकअप’ से मना किया, तो उन्हें मुफ्त शिक्षा या इलाज नहीं मिलेगा।
इसकी वजह से महिलाओं को सालों तक भयंकर दर्द, इन्फेक्शन और ब्लीडिंग का सामना करना पड़ा। सबसे दुखद बात यह रही कि कई महिलाएं जब शादी के बाद मां बनना चाहती थीं, तो वे चाहकर भी गर्भवती नहीं हो सकीं। सालों बाद जब उन्होंने जांच करवाई, तब जाकर पता चला कि उनके शरीर में दशकों से एक डिवाइस छिपी थी।
सच सामने आया तो कांप गई दुनिया
सालों तक इस मामले को दबाकर रखा गया। लेकिन 2020 के बाद जब पुराने मेडिकल रिकॉर्ड्स खंगाले गए और पीड़ित महिलाओं ने हिम्मत जुटाकर अपनी आपबीती सुनाई, तब जाकर यह ‘कॉइल स्कैंडल’ दुनिया के सामने आया। जांच में पता चला कि लगभग 4,500 महिलाओं और लड़कियों के साथ यह अमानवीय कृत्य किया गया था।
बढ़ते दबाव के बीच साल 2022 में डेनमार्क ने इसकी आधिकारिक जांच शुरू की। पिछले साल सितंबर में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने सार्वजनिक रूप से ग्रीनलैंड की महिलाओं से माफी मांगी और प्रभावित परिवारों को मुआवजे का भरोसा दिया।
आज के हालात: ट्रंप और आजादी की मांग
इस स्कैंडल के खुलासे ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के रिश्तों में गहरी खाई पैदा कर दी है। अब ग्रीनलैंड की युवा पीढ़ी पूरी तरह से आजादी की मांग कर रही है। वहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को खरीदने या वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की इच्छा जताकर हलचल तेज कर दी है। ट्रंप की इस दिलचस्पी के पीछे ग्रीनलैंड की रणनीतिक लोकेशन और वहां छिपे प्राकृतिक संसाधन हैं।
लेकिन ग्रीनलैंड के लोग अब किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। उनके लिए यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि उस सम्मान की है जो दशकों पहले एक गुप्त प्रयोग की बलि चढ़ा दिया गया था।
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