नई दिल्ली/कोपेनहेगन: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया से एक ऐसी खबर आ रही है जिसने सबको हैरान कर दिया है। डेनमार्क ने साफ कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। एक कड़े और चौंकाने वाले रुख में डेनमार्क की ओर से संकेत दिए गए हैं कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश करता है या आक्रमण करता है, तो डेनमार्क अपनी रक्षा में ‘पहले गोली चलाने’ से भी पीछे नहीं हटेगा।
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका के करीब है, लेकिन यह डेनमार्क साम्राज्य का एक स्वायत्त हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान, अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई थी। हालांकि डेनमार्क ने इसे ‘बेतुका’ कहकर खारिज कर दिया था, लेकिन हालिया भू-राजनीतिक तनाव ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
‘दोस्ती अपनी जगह, संप्रभुता अपनी जगह’
डेनमार्क और अमेरिका लंबे समय से नाटो (NATO) के सहयोगी रहे हैं। लेकिन ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व और वहां मौजूद खनिज संसाधनों के कारण महाशक्तियों की नजर हमेशा इस बर्फ से ढके द्वीप पर रहती है। डेनमार्क के अधिकारियों का कहना है कि वे किसी भी देश को, चाहे वह उनका सबसे करीबी दोस्त ही क्यों न हो, अपनी धरती पर बिना अनुमति कदम रखने नहीं देंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘शूट फर्स्ट’ (पहले गोली मारना) जैसा कड़ा शब्द इस्तेमाल करना यह दर्शाता है कि डेनमार्क अब अपनी सीमाओं को लेकर कितना गंभीर है। यह बयान केवल एक सैन्य चेतावनी नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक संदेश है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।
ग्रीनलैंड क्यों है इतना खास?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है। जलवायु परिवर्तन के कारण जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, वहां दबे हुए प्राकृतिक गैस, तेल और ‘रेयर अर्थ मेटल्स’ (दुर्लभ धातु) तक पहुंचना आसान हो गया है। इसके अलावा, सैन्य दृष्टि से भी ग्रीनलैंड का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से रूस और उत्तरी ध्रुव पर नजर रखना आसान है।
अमेरिका की प्रतिक्रिया का इंतजार
अभी तक वाशिंगटन की ओर से इस कड़े बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, कूटनीति के जानकारों का कहना है कि यह तनाव नाटो के भीतर दरार पैदा कर सकता है। डेनमार्क का यह रुख बताता है कि अब छोटे देश भी अपनी क्षेत्रीय अखंडता के लिए महाशक्तियों के सामने खड़े होने से नहीं डरते।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका इस पर सफाई देता है या फिर दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास आएगी।
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