पटना: क्या आपने कभी सोचा है कि सड़क किनारे हाथ फैलाने वाले भिक्षुक भी कभी उद्यमी (Entrepreneurs) बन सकते हैं? बिहार में यह बदलाव अब हकीकत बन रहा है। नीतीश सरकार की एक अनोखी पहल ने भिक्षुकों के हाथों में कटोरा हटाकर हुनर थमा दिया है। अब बिहार के भिक्षुक केवल दूसरों की मदद पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे खुद अगरबत्ती, जूते-चप्पल और जूट के बैग बनाकर समाज की मुख्यधारा में लौट रहे हैं।
सिर्फ छत नहीं, अब रोजगार भी!
मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति निवारण योजना के तहत बिहार सरकार ने भिक्षुकों को आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया है। पहले जहां पुनर्वास केंद्रों का मकसद सिर्फ उन्हें आश्रय और भोजन देना होता था, वहीं अब इसे ‘स्वावलंबन’ से जोड़ दिया गया है। इन केंद्रों में रहने वाले लोग अब अगरबत्ती, दीया-बाती, नारियल की झाड़ू और जूट के बेहतरीन उत्पाद तैयार कर रहे हैं। इन सामानों को बाजार में बेचा जा रहा है, जिससे उन्हें सम्मानजनक आय हो रही है।
इन 10 जिलों में चल रहा है अभियान
वर्तमान में बिहार के 10 प्रमुख जिलों में कुल 19 भिक्षुक पुनर्वास गृह (Rehabilitation Centers) चलाए जा रहे हैं। इनमें पटना, गया, नालंदा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा, भागलपुर, मुंगेर और सारण शामिल हैं। इन केंद्रों में न केवल वृद्ध और दिव्यांग भिक्षुकों को मुफ्त भोजन, कपड़े और इलाज मिलता है, बल्कि उन्हें योग, मनोरंजन और काउंसलिंग के जरिए मानसिक रूप से भी मजबूत बनाया जाता है।
विस्तार की तैयारी: 14 नए जिलों में खुलेंगे केंद्र
सरकार इस मॉडल की सफलता को देखते हुए इसका दायरा बढ़ा रही है। जल्द ही पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, वैशाली, अररिया, किशनगंज, जमुई, शेखपुरा, लखीसराय, मधेपुरा, औरंगाबाद, कटिहार, अरवल और रोहतास में 14 नए केंद्र शुरू होने वाले हैं। इसके अलावा, भोजपुर में दो ‘हाफ वे होम’ भी खोले जाएंगे।
जेब में आएंगे पैसे: सरकार दे रही है ₹10,000 की मदद
भिक्षुकों को अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए सरकार की ओर से 10,000 रुपये की एकमुश्त आर्थिक सहायता दी जा रही है। समाज कल्याण विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 544 भिक्षुकों को यह राशि दी जा चुकी है। इतना ही नहीं, सरकार उनका आधार कार्ड, पैन कार्ड बनवाने और बैंक खाता खुलवाने में भी मदद कर रही है ताकि वे सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ उठा सकें।
स्किल डेवलपमेंट से बढ़ा आत्मसम्मान
राज्य में फिलहाल छह ‘सक्षम उत्पादक समूह’ सक्रिय हैं। यहां भिक्षुकों को उनकी रुचि के अनुसार स्किल ट्रेनिंग दी जाती है। इन समूहों द्वारा बनाए गए उत्पादों की बिक्री से जो कमाई होती है, उसे सीधे उन भिक्षुकों के बीच बांट दिया जाता है जिन्होंने उसे बनाया है। इससे उनके भीतर यह विश्वास जागा है कि वे भी मेहनत करके इज्जत की रोटी कमा सकते हैं।
कैसे मिलता है योजना का लाभ?
इस योजना का लाभ उठाने के लिए कुछ जरूरी शर्तें हैं:
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आवेदक बिहार का मूल निवासी होना चाहिए।
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उसका जीवन पूरी तरह भिक्षावृत्ति पर निर्भर होना चाहिए।
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आयु की कोई सीमा नहीं है, लेकिन बच्चों और बुजुर्गों को प्राथमिकता दी जाती है।
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आवेदन के लिए आर्थिक स्थिति का प्रमाण और दिव्यांग होने पर मेडिकल सर्टिफिकेट जरूरी है।
कहां करें संपर्क? इच्छुक व्यक्ति या उनके परिजन अपने जिले के जिला सामाजिक सुरक्षा कोषांग या जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाई (सक्षम कार्यालय) में जाकर आवेदन कर सकते हैं। जांच के बाद उन्हें योजना से जोड़ दिया जाता है।
बिहार सरकार की यह पहल न केवल सड़कों से भिक्षावृत्ति को कम कर रही है, बल्कि उन लोगों को भी गरिमापूर्ण जीवन दे रही है जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है।
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