भरतपुर: खेती-किसानी में जब समस्या बड़ी हो और जेब छोटी, तो भारतीय किसानों का ‘देसी जुगाड़’ ही सबसे ज्यादा काम आता है। राजस्थान के भरतपुर जिले से एक ऐसी ही दिलचस्प तस्वीर सामने आई है, जहाँ किसानों ने अपनी लहलहाती गेहूं की फसल को आवारा पशुओं से बचाने के लिए एक अनोखा और बेहद सस्ता तरीका खोज निकाला है। ताज्जुब की बात यह है कि इस सुरक्षा घेरे को बनाने में न तो महंगी तारबंदी का इस्तेमाल हुआ है और न ही किसी हाई-टेक मशीन का, बल्कि यह कमाल किया है घर में पड़ी पुरानी साड़ियों ने।
महंगी फेंसिंग का सस्ता और टिकाऊ विकल्प
भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों आवारा पशुओं का आतंक किसानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। खासकर सर्दियों के इस मौसम में जब गेहूं की फसल हरी-भरी और कोमल होती है, तो नीलगाय और छुट्टा जानवर खेतों में घुसकर पूरी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। छोटे और मध्यम वर्ग के किसानों के लिए लोहे की जाली या कटीले तारों से फेंसिंग करवाना आर्थिक रूप से काफी बोझिल होता है। इसी समस्या का हल निकालते हुए किसानों ने अपनी पारंपरिक समझ का इस्तेमाल किया और पुरानी साड़ियों को खेत का ‘बॉडीगार्ड’ बना दिया।
साड़ियों में ऐसा क्या है जो डर जाते हैं पशु?
आप सोच रहे होंगे कि सिर्फ कपड़ों के टुकड़ों से जानवर कैसे रुक सकते हैं? इसके पीछे किसानों का एक मनोवैज्ञानिक तर्क है। किसान खेत की मेड़ (बाउंड्री) के चारों ओर बांस या लकड़ियों के सहारे पुरानी साड़ियों को बांध देते हैं।
-
हवा का खेल: जब भी हवा चलती है, तो ये साड़ियां लहराती हैं और उनसे एक हल्की आवाज आती है। इसे देखकर पशुओं को लगता है कि खेत में कोई इंसान मौजूद है।
-
रंगों का भ्रम: रंग-बिरंगी साड़ियां दूर से ही एक दीवार जैसी नजर आती हैं। साड़ियों की चमक और उनके हिलने-डुलने से पशु डर जाते हैं और खेत के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
कम मेहनत, ज्यादा सुकून
क्षेत्र के किसानों का कहना है कि पहले उन्हें कड़ाके की ठंड में रात-भर जागकर फसलों की रखवाली करनी पड़ती थी। लेकिन जब से उन्होंने साड़ियों की यह ‘देसी बाड़’ लगाई है, उन्हें काफी राहत मिली है। अब उन्हें दिन-रात खेत पर डंडा लेकर बैठने की जरूरत नहीं पड़ती। यह तरीका न केवल शून्य लागत वाला है, बल्कि पूरी तरह से इको-फ्रेंडली भी है। इससे न तो किसी पशु को चोट पहुँचती है और न ही पर्यावरण को नुकसान होता है।
कृषि विशेषज्ञों ने भी सराहा
भरतपुर के गांवों में यह तकनीक अब आग की तरह फैल रही है। एक किसान को देख दूसरा किसान भी इसे अपना रहा है। कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि कई बार स्थानीय और पारंपरिक तरीके आधुनिक मशीनों से कहीं ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं। यह तकनीक आत्मनिर्भर खेती का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ किसान संसाधनों की कमी को अपनी सूझबूझ से दूर कर रहा है।
भरतपुर के खेतों में चारों ओर बंधी ये रंग-बिरंगी साड़ियां अब केवल सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि किसानों की रचनात्मकता और उनकी मेहनत को बचाने की एक नई उम्मीद बन गई हैं।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से एकत्रित की गई है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस जानकारी को उपलब्ध स्रोतों से सत्यापित करें।
