ढाका: बांग्लादेश में हालात एक बार फिर बेकाबू होते नजर आ रहे हैं। विजय दिवस के जश्न के ठीक दो दिन बाद, 18 दिसंबर की रात जो कुछ भी हुआ, उसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और सांस्कृतिक धरोहरों को झकझोर कर रख दिया है। ढाका की सड़कों पर उतरी उग्र भीड़ ने देश के दो सबसे बड़े मीडिया संस्थानों— ‘प्रथम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ के साथ-साथ प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र ‘छायानट भवन‘ को अपना निशाना बनाया।
हैरानी की बात यह है कि इन संस्थानों पर हमला करते हुए भीड़ ने इन्हें ‘भारत का दलाल’ और ‘फासीवाद का दोस्त’ जैसे गंभीर आरोप लगाए। आखिर क्यों अचानक बांग्लादेश में भारत विरोध की आग इतनी भड़क गई है? क्या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक साजिश है?
उस्मान हादी की मौत और सुलगता गुस्सा
इस पूरे बवाल की शुरुआत ‘इंकलाब मंच’ के संयोजक उस्मान हादी की मौत के बाद हुई। हादी की मौत ने आग में घी का काम किया और देखते ही देखते भीड़ हिंसक हो गई। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ये मीडिया संस्थान भारत के पक्ष में खबरें दिखाते हैं।
जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश की आजादी में भारत की भूमिका अहम रही है, लेकिन हाल के वर्षों में सीमा पर होने वाली घटनाओं और तीस्ता जल बंटवारे जैसे मुद्दों ने वहां के आम लोगों में भारत के प्रति नाराजगी पैदा की है। अब इसी नाराजगी को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
क्या भारत विरोध सिर्फ एक बहाना है?
ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर काजी मारफूल इस्लाम का मानना है कि बांग्लादेश में लंबे समय से एक खास तरह का ‘आधिपत्य’ के खिलाफ प्रतिरोध रहा है। शेख हसीना के भारत में शरण लेने और उस्मान हादी के आरोपियों के भारत भाग जाने की अफवाहों ने इस गुस्से को और हवा दी है। हालांकि, बांग्लादेश पुलिस और गृह मंत्रालय ने साफ किया है कि आरोपियों के सीमा पार करने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।
“असली आजादी के लिए संस्थानों को खत्म करना होगा”
हमले के दौरान जो नारे लगे, वे डराने वाले थे। राजशाही विश्वविद्यालय के छात्र नेता मोस्ताकुर रहमान ने खुलेआम इन अखबारों को बंद करने की धमकी दी। वहीं, इस्लामी छात्र शिविर के नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि बाम (वामपंथी), शाहबागी और छायानट जैसे संस्थानों को मटियामेट करने के बाद ही बांग्लादेश को ‘असली आजादी’ मिलेगी। हालांकि, बाद में इन संगठनों ने सफाई दी कि यह ‘जुबान फिसलने’ का मामला था।
अंतरिम सरकार और सुरक्षा बलों पर गंभीर सवाल
इस पूरी घटना में सबसे चौंकाने वाला पहलू पुलिस और सेना की भूमिका रही। ‘प्रथम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ के प्रबंधन का आरोप है कि उन्होंने हमले से पहले सरकार के शीर्ष स्तर पर मदद मांगी थी, लेकिन कोई सहायता नहीं मिली।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में एक सैन्य अधिकारी हमलावरों को रोकने के बजाय उनसे ’20 मिनट का समय’ मांगते नजर आ रहे हैं ताकि इमारत में फंसे पत्रकारों को निकाला जा सके। वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक नुरुल कबीर का कहना है कि मोहम्मद यूनुस की सरकार में कुछ ऐसे लोग जरूर हैं, जो चाहते थे कि ये हमले हों। नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के संयोजक नाहिद इस्लाम ने भी इस हिंसा में सरकार के एक गुट की मिलीभगत की आशंका जताई है।
क्या चुनाव ही है समाधान?
बांग्लादेश पिछले 16 महीनों से अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नहीं होते, तब तक ऐसी हिंसा और अराजकता पर लगाम लगाना मुश्किल होगा। भारत विरोध की आड़ में लोकतांत्रिक संस्थानों को निशाना बनाना देश के भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत है।
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