Highlights
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ट्रंप ने ग्रीनलैंड को बताया बेहद जरूरी।
चीन और रूस की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिका की बड़ी चाल।
खनिज और प्राकृतिक संसाधनों का खजाना है यह बर्फीला द्वीप।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर चर्चा में हैं, और इस बार वजह कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक पूरा का पूरा द्वीप है। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड का उनके पास होना कितना जरूरी है। उन्होंने इसके लिए विशेष दूत (special envoy) भी तैनात कर दिए हैं। हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ट्रंप की इस “खरीदने” वाली मंशा से काफी नाराज हैं।
सवाल यह उठता है कि आखिर बर्फ की चादर से ढके इस इलाके में ऐसा क्या है, जिसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी सुपरपावर इतनी उतावली है?
रणनीतिक स्थिति: अमेरिका का सुरक्षा कवच
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में से एक बनाती है। यह यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच का सबसे छोटा रास्ता है। अगर अमेरिका यहां अपना पूरा नियंत्रण कर लेता है, तो वह अपना बैलिस्टिक मिसाइल वार्निंग सिस्टम और मजबूत कर पाएगा।
मौजूदा समय में रूस की परमाणु पनडुब्बियां और युद्धपोत अक्सर इस क्षेत्र के पानी से गुजरते हैं। अमेरिका चाहता है कि वह यहां एडवांस रडार सिस्टम लगाए ताकि रूस की हर हरकत पर पैनी नजर रखी जा सके।
चीन और रूस से मुकाबला
आर्कटिक क्षेत्र में अब सिर्फ बर्फ नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का मुकाबला चल रहा है। चीन के मालवाहक जहाज अब पैसिफिक आर्कटिक और रूस के ‘नार्दर्न सी रूट’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। नाटो (NATO) देश भी इस इलाके में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ट्रंप का मानना है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका के हाथ से निकला, तो चीन और रूस इस दरवाजे से अमेरिका की दहलीज तक पहुंच सकते हैं।
कुदरती खजाने पर नजर
ग्रीनलैंड सिर्फ रणनीतिक तौर पर ही खास नहीं है, बल्कि यह संसाधनों का भंडार भी है। यहां भारी मात्रा में:
दुर्लभ खनिज (Rare Earth Minerals)
कच्चा तेल (Crude Oil)
प्राकृतिक गैस
भले ही यहां विकास की रफ्तार धीमी रही हो, लेकिन ट्रंप जानते हैं कि भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए यह द्वीप एक ‘सोने की खान’ साबित हो सकता है।
1951 का वो समझौता और अमेरिकी बेस
ग्रीनलैंड में अमेरिका की मौजूदगी नई नहीं है। उत्तर-पश्चिम में स्थित पिटुफिक एयर बेस (Pituffik Air Base) पर अमेरिकी सेना दशकों से जमी हुई है। 1951 में हुए एक समझौते के तहत डेनमार्क ने अमेरिका को यहां सैन्य अड्डा बनाने की इजाजत दी थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि डेनमार्क ने अमेरिका को यहां पैर पसारने की जगह इसलिए दी क्योंकि उसके पास खुद इस विशाल द्वीप की रक्षा करने की ताकत नहीं है। बदले में अमेरिका उसे सुरक्षा की गारंटी देता है।
क्या आजाद हो पाएगा ग्रीनलैंड?
ग्रीनलैंड पहले डेनमार्क का हिस्सा था, लेकिन 2009 में इसे स्वायत्तता (Autonomy) मिल गई। अब यहां के लोगों के पास अधिकार है कि वे जनमत संग्रह (Referendum) के जरिए आजादी का फैसला ले सकें। हालांकि, 57,000 की आबादी वाले इस द्वीप के लोग डरे हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने डेनमार्क का साथ छोड़ा, तो वे सीधे अमेरिका के सीधे निशाने पर आ जाएंगे।
क्या होगा अगला कदम? अगर ग्रीनलैंड स्वतंत्र होता है, तो वह मार्शल आइलैंड्स की तरह अमेरिका के साथ एक ‘फ्री एसोसिएशन’ समझौता कर सकता है। इसमें अमेरिका सैन्य अधिकारों के बदले ग्रीनलैंड को भारी सब्सिडी और सुरक्षा प्रदान करेगा।
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