मीरा रोड, ठाणे की 30 साल पुरानी नव युवान हाउसिंग सोसाइटी ने साबित कर दिया है कि पुरानी इमारतें भी क्लाइमेट-फ्रेंडली बन सकती हैं। इस सोसाइटी ने अपने बिजली और पानी के खर्च में जबरदस्त कटौती कर न सिर्फ लाखों रुपये बचाए बल्कि दुनिया भर में नाम भी कमाया।
एशिया की पहली सोसाइटी बनी, जिसने पाया EDGE Advanced सर्टिफिकेशन
नव युवान हाउसिंग सोसाइटी, जिसमें करीब 280 परिवार रहते हैं, ने अपने पावर बिल को दो-तिहाई तक कम कर दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहल आगा खान एजेंसी फॉर हैबिटेट (AKAH) के सहयोग से शुरू हुई।
इस प्रयास ने सोसाइटी को एशिया की पहली ऐसी हाउसिंग सोसाइटी बना दिया है जिसे EDGE Advanced Green Building Certification मिला है। यह सर्टिफिकेट वर्ल्ड बैंक ग्रुप की इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IFC) द्वारा दिया जाता है।
₹52,000 से घटकर ₹18,000 तक आया बिजली का बिल
सोसाइटी मैनेजिंग कमेटी के सदस्य रहीम कारोवालिया (52) ने बताया—
“पहले हमारा मासिक बिजली बिल करीब 52,000 रुपये आता था, जो अब घटकर सिर्फ 18,000 रुपये रह गया है।”
उन्होंने एक मोशन-सेंसर ट्यूबलाइट दिखाकर समझाया कि यह लाइट इंसान की गतिविधि के आधार पर अपने आप डिम या ब्राइट होती है। दिखने में साधारण लगने वाला यह बदलाव असल में बिजली खपत घटाने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है।
कौन-कौन से बदलाव किए गए?
सोसाइटी ने अक्टूबर 2024 से कई बड़े कदम उठाए—
150 मोशन-सेंसर लाइट्स लगाई गईं, जो कॉरिडोर और सीढ़ियों में ऑटोमैटिक चलती-बंद होती हैं।
14 हाई-इफिशिएंसी फ्लडलाइट्स पार्किंग एरिया में लगाई गईं।
सोसाइटी की छत पर 44 किलोवॉट का सोलर पैनल सिस्टम लगाया गया।
सोसाइटी में किचन गार्डन की शुरुआत हुई, ताकि प्राकृतिक तरीके से सब्जियां उगाई जा सकें।
अब एक कम्पोस्टिंग यूनिट लगाने की तैयारी है, जिससे कचरे को खाद में बदला जाएगा और शहरी खेती को बढ़ावा मिलेगा।
बचत के साथ-साथ पर्यावरण की भी सुरक्षा
इन सभी उपायों से न केवल बिजली की बचत हुई है बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी काफी घटा है। इससे सोसाइटी पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार कदम उठाने का उदाहरण बन गई है।
क्यों है यह उपलब्धि खास?
भारत में ज्यादातर पुरानी हाउसिंग सोसायटीज में मेंटेनेंस और बिल कम करना बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में नव युवान सोसाइटी का यह कदम बाकी सोसायटीज के लिए एक मॉडल बन गया है। यह पहल दिखाती है कि अगर सामूहिक इच्छाशक्ति हो तो पुरानी इमारतें भी सस्टेनेबल और इको-फ्रेंडली बन सकती हैं।
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